पूजाविधिः जीवित पुत्रिका व्रत-कथा
फिर स्नानादि आदि नित्य कर्म करने के बाद एकाग्रचित्त होकर स्वच्छ स्थान पर खड़े होकर देश और काल का जप करते हुए भी उन्हें स्वच्छ आसन पर बिठाकर उनका आवाहन करना चाहिए। मंत्र हैं: जीवपुत्री! यहाँ आओ, हे निष्पाप, जो गौरी का रूप धारण करता है।
भगवान की चरण कमलों से यहाँ निकट रहो। आओ, हे व्याघ्र राजा, हे जीमूतवाहन! कृपया, हे भगवान, मुझे हमेशा यहां अपनी उपस्थिति प्रदान करें। हे पवित्र मन्नतों वाली तुम अपने स्थान से शीघ्र यहाँ आ जाओ मुझे पूजा के लिए अपनी उपस्थिति दिखाओ और मेरे पति और पुत्रों की रक्षा करो। आप हमेशा भगवान शिव और भगवान शिव के हाथों में रहें। आप सदैव मेरे धन, धान्य और सन्तान की वृद्धि करें॥ मुझे एक कोमल पुत्र देने के लिए और मेरे स्वामी के जीवन को बचाने के लिए। हे परम सौभाग्यशाली, मैं आपकी बारंबार साइन में वंदना करता हूं। मेरे लिए यह हमेशा मेरे सौंदर्य, धन और भाग्य को बढ़ाने के लिए है। मेरे द्वारा की गई इस प्रिय पूजा को स्वीकार करो और यहाँ मुझ पर कृपा करो। यह कहा जाता है। तब जीवित पुत्री और जीमूतवाहन ने सोलह संस्कार किए
वंदना करो, झुको। तंत्र मंत्र – हे जीवितों की परम सौभाग्यशाली पुत्री मेरे पुत्र जीवित रहें। मेरे पुत्रों और मेरे पति की आयु सदैव बढ़ाओ। हे राजाओं में बाघ, हे मेघों पर सवार राजा, मैं आपको प्रणाम करता हूं। पतियों और पुत्रों की समृद्धि बढ़ाओ, हे प्रजा के स्वामी! ॥2॥ प्रणाम करने के बाद हाथ जोड़कर कथा का श्रवण करना चाहिए।
जीवित पुत्रिका व्रत-कथा
अर्थ :- एक बार नैमिषारण्य के निवासी ऋषियों ने संसार के कल्याणार्थ सूतजी से पूछा ।।1।। हे सूत ! कराल कलिकाल में लोगों के बालक किस तरह दीर्घायु होंगे सो कहिए ? ।।2।। सूतजी बोले- जब द्वापर का अन्त और कलियुग का आरम्भ था, उसी समय बहुत-सी शोकाकुल स्त्रियों ने आपस में सलाह की ॥13॥ कि क्या इस कलि में माता के जीवित रहते पुत्र मर जाएँगे? जब वे आपस में कुछ निर्णय नहीं कर सकीं तब गौतमजी के पास पूछने के लिए गयीं ||4||
तो उस समय गौतमजी आनन्द के साथ बैठे थे। उनके सामने जाकर उन्होंने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया ॥15॥ तदनन्तर स्त्रियोंने पूछा- ‘हे प्रभो ! इस कलियुग में लोगों के पुत्र किस तरह जीवित रहेंगे ? इसके लिए कोई व्रत या तप हो तो कृपा करके बताइये ‘॥6॥। इस तरह उनकी बात सुनकर गौतमजी बोले- ‘आपसे मैं वही बात कहूंगा, जो मैंने पहले से सुन रखी है’ गौतमजीनेकहा- जब महाभारत-युद्ध का अन्त हो गया और द्रोणपुत्र अश्वत्थामा के द्वारा अपने बेटों को मरा देखकर सब पाण्डव बड़े दुःखी हुए तो पुत्र के शोक से व्याकुल होकर द्रौपदी अपनी सखियों के साथ ब्राह्मण श्रेष्ठ धौम्य के पास गयी और उसने धौम्य से कहा-‘हे विप्रेन्द्र ! कौन-सा उपाय करने से बच्चे दीर्घायु हो सकते हैं, कृपा करके ठीक-ठीक कहिये ॥10॥
धौम्य बोले-सत्ययुग में सत्यवचन बोलनेवाला, सत्याचरण करनेवाला, समदर्शी जीमूतवाहन नामक एक राजा था ।।11।। एक बार वह अपनी स्त्री के साथ अपनी ससुराल गया और वहीं रहने लगा ।।12। एक दिन आधी रात के समय पुत्र के शोक से व्याकुल कोई स्त्री रोने लगी। क्योंकि वह अपने बेटे के दर्शन से निराश हो चुकी थी उसका पुत्र मर चुका था ॥13॥ वह रोती हुई कहती थी ‘हाय मुझ बूढ़ी माता के सामने मेरा बेटा मरा जा रहा है !’ उसका रुदन सुनकर राजा जीमूतवाहन का तो मानों हृदय विदीर्ण हो गया ||14|| वह तत्काल उस स्त्री के पास गया और उससे पूछा- ‘तुम्हारा बेटा कैसे मरा है ?’ बूढ़ी ने कहा-गरुड़ प्रतिदिन आकर गाँव के लड़कों को खा जाता हैं ||15| इसपर दयालु राजा ने कहा-‘माता ! अब तुम रोओ मत । आनन्द से बैठो-मैं तुम्हारे बच्चे को बचाने का यत्न करता हूँ’ ऐसा कहकर राजा उस स्थान पर गया, जहाँ गरुड़ आकर प्रतिदिन मांस खाया करता था। उसी समय गरुड़ भी उसपर टूट पड़ा और
राजा के शरीर का मांस खाने लगा ||17|| जब अतिशय तेजस्वी गरुड़ ने राजा का बायाँ अङ्ग खा लिया तो झटपट राजा ने अपना दाहिना अङ्ग फेर कर गरुड़ के सामने कर दिया ।।18।।
यह देखकर गरुड़जी ने कहा- ‘देवयोनियों में तुम कौन हो? तुम मनुष्य तो नहीं जान पड़ते । अच्छा, अपना जन्म और कुल बताओ’ |119|| पीड़ा से व्याकुल मनवाले राजा ने कहा-‘हे पक्षिराज । इस तरह के प्रश्न करना व्यर्थ है, तुम अपनी इच्छाभर मेरा मांस खाओ’ यह सुनकर गरुड़ रुक गये और बड़े आदर से राजा चिरं जाता हि जीवन्तु के जन्म और कुल की बात पूछने लगे |121|| राजा ने कहा-‘मेरी माता का नाम है, शैव्या और मेरे पिता का नाम शालिवाहन है। सूर्यवंश में मेरा जन्म हुआ है और जीमूतवाहन मेरा नाम है’ ॥22॥ राजा की दयालुता देखकर गरुड़ ने कहा- ‘हे महाभाग ! तुम्हारे मन में जो अभिलाषा हो, वह वर माँगो’ राजा ने कहा- ‘हे पक्षिराज ! यदि आप मुझे वर दे रहे हैं तो वर दीजिए कि, आपने अब तक जिन प्राणियों को खाया है, वे सब जीवित हो जाएँ 11241 हे स्वामिन्! अबसे आप यहाँ बालकों को न खायें और कोई ऐसा उपाय करें कि जहाँ जो उत्पन्न हों आयु पूरी करने के बाद ही मृत्यु की प्राप्ति हो| राजा को वरदान देकर गरुड वैकुण्ठ धाम को चले गये और राजा भी अपनी पत्नी के साथ अपने नगर को वापस चले आये धौम्य द्रौपदी से कहते हैं-‘हे देवि मैंने यह अतिशय दुर्लभ व्रत तुमको बताया है। इस व्रत को करने से बच्चे दीर्घायु होते हैं ॥38॥ हे देवि ! तुम भी पूर्वोक्त विधि से यह व्रत और दुर्गाजी का पूजन करो तो तुम्हें अभिलषित फल प्राप्त होगा’ ॥39॥ मुनिराज धौम्य की बात सुनकर द्रौपदी के हृदय में एक प्रकार का कौतुहल उत्पन्न हुआ। और, पुरवासिनी स्त्रियों को बुलाकर उनके साथ यह उत्तम व्रत किया |
गौतम ने कहा- यह व्रत और इसके प्रभाव को किसी एक चिह्नी ने सुन लिया और अपनी सखी सियारिन को बतलाया | इसके बाद पीपल वृक्ष की शाखा पर बैठकर उस चिह्नी ने और उस वृक्ष के खोत में बैठकर सियारिन ने भी व्रत किया फिर वही चिह्नी किसी उत्तम ब्राह्मण के मुँह से यह कथा सुन आयी और पीपल के खोत में बैठी हुई अपनी सखी को सुनाया 1431 सियारिन ने आधी कथा सुनी थी कि उसे भूख लग गयी और वह उसी समय शव से भरे हुए श्मशान में पहुँची | वहाँ उसने इच्छाभर मांस का भोजन किया और चिह्नी बिना कुछ खाये-पिये रह गयी | और सबेरा हो गया | सबेरे वह गौशाले में गयी और वहाँ गौ का दूध पिया । इस तरह नवमी को उसने पारण किया ।। कुछ दिनों बाद वे दोनों मर गयीं और अयोध्या में किसी धनी व्यापारी के घर जन्मीं | संयोग से उन दोनों का जन्म एक ही घर में हुआ, जिसमें सियारिन ज्येष्ठ हुई और चिह्नी छोटी ॥48॥ वे दोनों सभी शुभ लक्षणों से युक्त थीं । इसलिए बड़ी लड़की काशिराज के और छोटी उसके मन्त्री के साथ गार्हपत्य अग्नि के सामने विधिपूर्वक ब्याही गयीं । पूर्वजन्म के कर्मफल से वह मृगनयनी रानी हुई ॥
जिस-किसी भी सन्तान को उत्पन्न करती, वह मर जाती थी और पूर्वजन्म की बातों को स्मरण करनेवाली मन्त्री की पत्नी ने अष्ट वसुओं के सदृश तेजस्वी आठ बेटे उत्पन्न किये और सभी जीवित रह गये। अपनी बहिन के पुत्रों को जीवित देखकर ईर्ष्यावश राजपत्नी ने अपने स्वामी से कहा कि, यदि तुम मुझे जीवित रखना चाहते हो तो इस मन्त्री के भी पुत्रों को उसी जगह भेज दो जहाँ मेरे बेटे गये हैं अर्थात् इन्हें मार डालो ॥
यह सुनकर राजा ने उस मन्त्री के पुत्रों को मारने के लिए कई प्रकार के उद्योग किये ||54|| पर मन्त्री- पत्नी ने जीवत्पुत्रिका के पुण्य-बल से बचा लिया। एक दिन राजा ने अपने आदमियों से उन पुत्रों का सिर कटवाकर पिटारी में रखवाया और वह पिटारी उनकी माता (मन्त्री-पत्नी) के पास भेज दिया । किन्तु वे आठों सिर बेशकीमती जवाहरात हो गये । और भले- चंगे वे आठों लड़के अपनी माता के पास वापस चले गये । उनको जीवित देखकर राजपत्नी को बड़ा विस्मय हुआ ! ||57|| अन्त में, वह मन्त्री की पत्नी के पास आयी और उसने पूछा- बहन ! तुमने कौन-सा ऐसा पुण्य किया है जिससे बार-बार मारे जाने पर भी तुम्हारे बेटे नहीं मरते ||58|| इसपर मन्त्री की पत्नी ने कहा- पूर्व जन्म में मैं चिह्नी थी और तुम सियारिन। दोनों ने व्रत किया था | तुमने व्रत के नियमों का भली-भाँति पालन नहीं किया था। और मैंने किया था, इसी दोष से हे बहिन ! तुम्हारे बेटे नहीं जीते हैं ओ राजरानी ! अब भी तुम उस जीवत्पुत्रिका व्रत को करो तो तुम्हारे बेटे दीर्घायु होंगे मैं तुमसे सच-सच कह रही हूँ।
उसके कथनानुसार रानी ने व्रत किया तभी से उसके कई बेटे सुन्दर और दीर्घायु होकर बड़े-बड़े राजा हुए | सूतजी कहते हैं कि, सब प्रकार का आनन्द देनेवाला मैंने यह दिव्य व्रत बतलाया। स्त्रियाँ चिरंजीवी सन्तान चाहती हों तो विधिपूर्वक यह व्रत करें !!